
भुखमरी और ताड़ की रोटी
दादा जी जब हम पर ग़ुस्सा करते थे,
उस ग़ुस्से में छिपा होता था उनका प्रेम,
हराम की रोटी की ओर
भटके हमारे क़दमों को रोकना,
उनका असली मक़सद था।
मेरी नाकामी की आहट पाकर
वे अपनी भुखमरी के दिनों की परिभाषा
हमारे सामने रख देना चाहते थे—
याद दिलाना चाहते थे कि
ज़िंदगी केवल सुख की थाली नहीं,
दुःख का असीम विस्तार भी है।
पर हम कभी समझ न सके
उनके गुज़रे दिनों की कड़वी परिभाषा।
कैसे वे ताड़ के पेड़ तले
पकते फलों की प्रतीक्षा में
रातभर बैठे रह जाते थे—
और सुबह का सूरज
अनजाने ही उनकी आँखों से निकल जाता था।
उनकी आँखें तो टिकी रहती थीं
ताड़ के गुच्छों पर।
पके ताड़ को चुन-चुनकर
बोरी में भर लाना,
पीठ पर लादकर घर ले आना,
फिर कभी रस चूसना,
कभी उसका रोटी बनाना—
यही था उनका उजास,
यही था उनका संबल।
दुःख की दलदल से
जीवन-गाड़ी को खींचकर निकाल लेने का
एक लोक-ज्ञान,
जो वे हमें देना चाहते थे—
कि अँधेरों में भी छिपा होता है
रौशनी का स्वाद,
बस उसे ढूँढ़ना पड़ता है।
काश! उस समय हम
बहसबाज़ी छोड़कर
दादा जी के पास बैठ जाते,
उनके भुखमरी के दिनों का
जीवंत शब्दकोष समझ लेते—
तो आज शायद
हम भी उनकी तरह
अपने जीवन की गाड़ी को
दुःख की दलदल से
धीरे-धीरे खींचकर
आसानी से बाहर निकाल पाते।
दादा जी जब ग़ुस्सा करते थे,
तो उस ग़ुस्से में
उनकी चुप्पी की विरासत छिपी थी—
हमें रोकना,
भटकने से बचाना,
भुखमरी से सीखा हुआ
जीवन-दर्शन सिखाना।
स्वरचित,
तेज नारायण राय
दुमका (झारखंड)
संपर्क सूत्र-6207586995
विद्या का उजियारा
कलम, कागज़, किताब से
जो करता सच्चा प्यार,
उसकी बुद्धि-विचारधारा में
भरता तेज़ उजियार।
नदी न रुकती कभी कहीं,
बहती निर्मल जलधार,
वैसे ही मेधावी मनुज
बढ़ता हर पल, हर बार।
जिसमें ज्ञान का दीप जला,
वो चाँद सितारों तक जाता,
उसकी ज्योति से जग चमकता,
हर मन आलोकित हो जाता।
कभी मिट्टी-सा बिखर भी जाए,
काँच-सा टूटे बार-बार,
पर सिर न झुकाए सत्य के आगे,
उच्च रहे उसका विचार।
कंठ-कंठ में शुद्ध वाणी,
हर मन में नव विस्तार,
ऐसे ही जन पर बरसता
सरस्वती-माँ का प्यार।
वही ज्ञानी, वही कबीर,
जो जग का करे उपकार,
राष्ट्र करे नमन उन्हें,
झुक-झुक बारंबार।
कलम, कागज़, किताब जिन्हें
लगते हैं जीवन के सार,
उनके मन में रहता सदा
बसंती सुख का संसार।
वही ज्ञानी, वही सृजनहार,
वही गढ़े सुख का भंडार।
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स्वरचित
कवि- तेज नारायण राय दुमका झारखंड
संपर्क सूत्र-6207586995
